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ग़ालिब के ख़त - 2

फरवरी सन् 1852 ई.असदुल्ला
शफ़ीक़ बित-तहक़ीक़ मुंशी हरगोपाल तफ्ता हमेशा सलामत रहें,
आपका वह ख़त जो आपने कानपुर से भेजा था, पहुँचा। बाबू साहिब के सैर-ओ-सफ़र का हाल और आपका लखनऊ जाना और वहाँ के शुअ़रा से मिलना, सब मालूम हुआ। अशआ़र जनाब रिंद के पहुँचने के एक हफ्ता के बाद दुरुस्त हो गए और इस्लाह और इशारे और फ़वायद जैसा कि मेरा शेवाहै, अ़मल में आया।
जब तक कि उनका या तुम्हारा ख़त न आवे और इक़ामतगाह मालूम न हो, मैं वे काग़ज जरूरी कहाँ भेजूँ और क्यों कर भेजूँ? अब जो तुम्हारे लिखने से जाना कि 19 फरवरी तक अकबराबाद आओगे, तो मैंने यह ख़त तुम्हारे नाम लिखकर लिफ़ाफ़ा कर रखा है। आज उन्नीसवीं है, परसों इक्कीसवीं को लिफ़ाफ़ा आगरा को रवाना होगा।
बाबू साहिब को मैंने ख़त इस वास्ते नहीं लिखा कि जो कुछ लिखना चाहिए था, वह ख़ात्मा-ए-औराक़-ए-अशआ़र पर लिख दिया है। तुमको चाहिए कि उनकी ‍ख़िदमत में मेरा सलाम पहुँचाओ और सफ़र के अंजाब और हसूल-ए-मराम की मुबारकबाद दो और औराक़-ए-अशआ़र गुज़रानो और यह अर्ज करो कि जो इबारत खात्मे पर मरक़ूम है, उसको ग़ौर से देखिए और भूल जाइए। बस तमाम हुआ वह पयाम कि जो बाबू साहब की ख़िदमत में था।
अब फिर तुमसे कहता हूँ कि वह जो तुमने उस शख्स 'कोली' का हाल लिखा था, मालूम हुआ। हरचंद एतराज़ तो उनका लग्व और पुरसिश उनकी बेमज़ा हो, मगर हमारा यह मंसब नहीं कि मोतरिज़ को जवाब न दें या सायल से बात न करें। तुम्हारे शेर पर एतराज़, और इस राह से कि वह हमारा देखा हुआ है, गोया हम पर है। इससे हमें काम नहीं कि वे मानें या न मानें, कलाम हमारा अपने नफ़स में माकूल व उस्तवार है। जो ज़बांदां होगा, वह समझ लेगा।
ग़लत फ़हम व कज अंदेश लोग न समझें | हमको तमाम ख़लक़ की तहज़ीब व तलक़ीन से क्या इलाक़ा? तालीम व तलक़ीन वास्ते दोस्तों के और यारों के हैं, न वास्ते अग़ियार के। तुम्हें याद होगा कि मैंने तुम्हें बारहा समझाया है कि खुद ग़लती पर न रहो और गै़र की ग़लती से काम न रखो। आज तुम्हारा कलाम वह नहीं कि कोई उस पर गिरिफ्त कर सकें।

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Mirza Ghalib Documentary part 3


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Ghalib ke Khat-1

(अगस्त सन् 1849 ई)
महाराज,
आपका मेहरबानीनामा पहुँचा। दिल मेरा अगर्चे खुश न हुआ, लेकिन नाखुश भी न रहा। बहरहाल, मुझको कि नालायक़ व ज़लीलतरीन ख़लनायक़ हूँ, अपना दुआग़ो समझते रहो। क्या करूँ? अपना शेवा तर्क नहीं किया जाता। वह रविश हिंदुस्तानी फ़ारसी लिखने वालों की मुझको नहीं आती कि बिल्कुल भाटों की तरह बकना शुरू करें। मेरे क़सीदे देखो, तशबीब के शेर बहत पाओगे, और मदह के शेर कमतर। नस्र में भी यही हाल है।
नवाब मुस्तफ़ा ख़ाँ के तज़करे की तक़रीज़ को मुलाहिज़ा करो कि उनकी मदह कितनी है। मिर्जा रहीमुद्दीन बहादुर हया तख़ल्लुस के दीवान के दीबाचा को देखो। वह जो तक़रीज़ 'दीवान-ए-हाफिज़' की बमूजिब फ़रमाइश जान जाकोब बहादुर के लिखी है, उसके देखो कि फ़क़त एक बैत में उनका नाम और उनकी मदह आई है और बाक़ी सारी नस्र में कुछ और ही मतालिब हैं।
वल्लाह बिल्लाह, अगर किसी शहज़ादे या अमीरज़ादे के दीवान का दीबाचा लिखता, तो उसकी इतनी मदह न करता जितनी तुम्हारी मदह की है। हमको और हमारी रविश अगर पहचानते, तो इतनी मदह को बहुत जानते। किस्सा मुख्तसर तुम्हारी ख़ातिर की और एक फि़क़रा तुम्हारे नाम का बदलकर उसके इवज़ एक ‍फ़िक़रा और लिख दिया है।
जो ग़िज़ा खाया करते हैं, खाया करें। पानी दिन-रात, जब प्यास लगे, यही पिएँ। तबरीद की हाजत पड़े, इसी पानी में पिएँ। रोज जोश करवाकर, छनवाकर रख छोड़ें। बरस दिन में इसका फ़ायदा मालूम होगा। मेरा सलाम कहकर यह नुस्ख़ा अर्ज कर देना। आगे उनको इख्तियार है।
इससे ज्यादा भई, मेरी रविश नहीं। ज़ाहिरा तुम खुद फिक्र नहीं करते, और हज़रात के बहकाने में आ जाते हो। वह साहिब तो बेशतर इस नज्म व नस्र को मोहमल कहेंगे। किस वास्ते कि ‍उनके कान इस आवाज़ से आशना नहीं। जो लोग कि क़तील को अच्छे लिखने वालों में जानेंगे, वह नज्म व नस्र की खूबी को क्या पहचानेंगे?
जो ग़िज़ा खाया करते हैं, खाया करें। पानी दिन-रात, जब प्यास लगे, यही पिएँ। तबरीद की हाजत पड़े, इसी पानी में पिएँ। रोज जोश करवाकर, छनवाकर रख छोड़ें। बरस दिन में इसका फ़ायदा मालूम होगा। मेरा सलाम कहकर यह नुस्ख़ा अर्ज कर देना। आगे उनको इख्तियार है।

हमारे शफ़ीक़ मुंशी नबी बख्श साहिब को क्या आरिज़ा है कि जिसको तुम लिखते हो, माअ़जनब से भी न गया। एक नुस्ख़ा 'तिब़-ए-मुहम्मद हुस्सैन ख़ानी' में लिखा है और वह बहुत बेज़रर और बहुत सूदमंद है, मगर असर उसका देर में ज़ाहिर होता है। वह नुस्खा यह है कि पान सात सेर पानी देवे और उसमें सेर पीछे तोला-भर चोब चीनी कूटकर मिला दें और उसको जोश करें, इस कद्र कि चहारम पानी जल जावे। फिर उस बाक़ी पानी को छानकर कोरी ठलिया में भर रखें। और जब बासी हो जावे, उसको पिएँ।

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